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शिक्षा व्यवस्था में रुचि रखने वाले सभी लोगों को इस पर चिंतित होना चाहिए कि कभी संस्थान का पर्याय माने जाने वाले कुलपति पद की गरिमा बड़ी तेजी से गिरी है. देश में कुलपतियों की एकमात्र योग्यता राजनीतिक नेतृत्व से निकटता रह गई है. इसके कारण सामान्य विश्वविद्यालयों की साख पर गंभीर संकट खड़ा हो रहा है. निजी विश्वविद्यालयों की हालत तो और भी दयनीय है. कृषि एवं खाद्य विशेषज्ञ देविंदर शर्मा का विश्लेषण


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